क्यूँ दिल मेरा उस बेवफा का तलबगार था

Posted by रवि प्रकाश

मुद्दत से जिसके वास्ते दिल बेकरार था
वो लौट कर न आये मगर इंतज़ार था


जो हमसफ़र थे छोड़ गए राह में मुझे
मैं फँस गया भंवर में, वो दरया के पार थे !

मंजिल करीब आई तुओ वो दूर हो गए
इतना तो तुम बताओ की ये कैसा प्यार था !

ना वो सुकून से बैठे, ना मुझको करार था
ये बात उम्र भर समझ ना पाया मैं

क्यूँ दिल मेरा उस बेवफा का तलबगार था

जिन्दगी से चाहे जितना प्यार कर लो,

Posted by रवि प्रकाश

एक अजब सी पहेली हैं जिन्दगी,
सबके साथ होते हुए भी अकेली हैं जिन्दगी!
कभी तो एक प्यारा सा अरमान हैं जिन्दगी,
तो कभी दर्द से भरा तूफ़ान हैं जिन्दगी !

कभी फुलो जैसी मासूम हो जाती हैं जिन्दगी,
तो कभी गुनाहों का बोझ बन जाती हैं जिन्दगी !
कभी तो गुलो से भरा गुलिस्ता हैं जिन्दगी,
तो कभी काँटों से भरा रास्ता हैं जिन्दगी !

कोई तो बता दे क्या हैं जिन्दगी,
सुना हैं चाँद रोज की मेहमान हैं जिदंगी !
जिन्दगी को छोड़ एक दिन जाना पड़ेगा,
मौत को उस पल गले लगाना पड़ेगा!


जिन्दगी से चाहे जितना प्यार कर लो,
होती हैं आखिर बेवफा ये जिन्दगी!
ऐ बन्दे की कुछ ऐसे जी जाए जिन्दगी,
की बन जाए एक एहसास एक इतिहास जिन्दगी

ये मुनासीब नही भुला दूँ उसे

Posted by रवि प्रकाश

इस टूटे हुए दिल के लिए अब दुआ कैसे करूँ
दर्द जब तूने दिया है तो गिला कैसे करूँ

अक्सर चलता रहा तनहा सफ़र में येही सोचा के मै
ये मुक़म्मल था सफ़र जो मैंने किया
अब तेरे बिना बाकि सफ़र कैसे करूँ

उम्र भर की मोह्बात का क्या सिला दिया है तुने
तू ही बता दे तेरे एन जफ़ाओं का गिला कैसे करूँ


थी कोई मेरे ही हाथों की लकीरों में कुछ कमी
अपनी तकदीर का अब तुझसे गिला कैसे करूँ

मेरी हर साँस में बसा है तू ज़न्दगी बन के ऐ दोस्त
तुझे भुला के मै बेवफाई कैसे करूँ ..

ये मुनासीब नही भुला दूँ उसे ..
तू बता इस जिस्म से ये जान जुदा कैसे करूँ