ये मुनासीब नही भुला दूँ उसे

Posted by रवि प्रकाश

इस टूटे हुए दिल के लिए अब दुआ कैसे करूँ
दर्द जब तूने दिया है तो गिला कैसे करूँ

अक्सर चलता रहा तनहा सफ़र में येही सोचा के मै
ये मुक़म्मल था सफ़र जो मैंने किया
अब तेरे बिना बाकि सफ़र कैसे करूँ

उम्र भर की मोह्बात का क्या सिला दिया है तुने
तू ही बता दे तेरे एन जफ़ाओं का गिला कैसे करूँ


थी कोई मेरे ही हाथों की लकीरों में कुछ कमी
अपनी तकदीर का अब तुझसे गिला कैसे करूँ

मेरी हर साँस में बसा है तू ज़न्दगी बन के ऐ दोस्त
तुझे भुला के मै बेवफाई कैसे करूँ ..

ये मुनासीब नही भुला दूँ उसे ..
तू बता इस जिस्म से ये जान जुदा कैसे करूँ

This entry was posted at 8:24 PM . You can follow any responses to this entry through the .

0 comments