मुद्दत से जिसके वास्ते दिल बेकरार था
वो लौट कर न आये मगर इंतज़ार था
जो हमसफ़र थे छोड़ गए राह में मुझे
मैं फँस गया भंवर में, वो दरया के पार थे !
मंजिल करीब आई तुओ वो दूर हो गए
इतना तो तुम बताओ की ये कैसा प्यार था !
ना वो सुकून से बैठे, ना मुझको करार था
ये बात उम्र भर समझ ना पाया मैं
क्यूँ दिल मेरा उस बेवफा का तलबगार था
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at 10:43 AM
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